कितना दिया दर्द तु कितना रुलाई दिल्ली
मुझको तो आज तक तु रास ना आई दिल्ली
जहां मैं आया था, वहीं पर खड़ा हूं मैं अब तक
आखिर क्यों मुझको? दिल्ली तु बुलाई दिल्ली,
सुना है पल में तु तकदीर बदल देती है,
फकीर के हाथों की भी लकीर बदल देती है
मैने तो फर्ज किया, कुछ भी कभी न हर्ज किया
मेरे वजूद से फिर क्यूं इतनी रुसवाई दिल्ली
जहां भी लेते हैं तेरा नाम वफा से लेते हैं
मेरी ही साथ क्यों फिर इतनी बेवफाई दिल्ली
लोग तो नाम तेरा क्या अदा से लेते हैं
गालिब-ए-शे'र है तु, मीर-ए-रुबाई दिल्ली
मैं तो अब जाउंगा बता नाम तुझे क्या दे दूं
मेरे लिए तु बस एक हरजाई दिल्ली
नोट- क्रमश:...कविता ठीक भी करनी है..
कोरे कागजों में सिमटी ग़ुमनाम जिंदगी... मैं अजब हूं, अगर अजब दास्तान लिख सकूं कोरे कागज़ पर हृदय का सब तुफ़ान लिख सकूं...
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Wednesday, September 28, 2011
Monday, March 28, 2011
अजीब शहर है अजब सियासत है.
ऩजर उठी थी तो आगाज़-ए-साज़ और बजा
नज़र झुकी कि अंजाम बदल जाता है...
मुझे न खौफ़ है न खुंदश है इस रवायत से,
मलाल ये कि मेरा काम बदल जाता है..
प्याला खनका भी नहीं,पैमाना छलका भी नहीं
नशा जमा भी नहीं कि जाम बदल जाता है
अजीब महफिल है,अजीब आलम है..
दो महीना भी नहीं,निज़ाम बदल जाता है।
भरोसा मिलता है कुछ घर लौट कर जाते जाते
वापस आने पर पैगाम बदल जाता है
यहां इंसान भी फिरता है हालात-ए-वक्त की तरह
चेहरा देखकर सलाम बदल जाता है...
मिज़ाजे हुक्मरां तय करती है हवा-ए-रुख़
वक़्त के साथ खास-ओ-आम बदल जाता है
हर-एक-शख्स ने चेहरे पर डाल रख्खी है नक़ाब
ज़रुरत जैसी वैसा नाम बदल जाता है
वही है देखो जिसने अंधेरों में फैलाई अफ़वा
सुबह हुई तो वो सरेआम बदल जाता है..
अजीब शहर है अजब सियासत है..
सुबह कुछ और है...शाम बदल जाता है..
नज़र झुकी कि अंजाम बदल जाता है...
मुझे न खौफ़ है न खुंदश है इस रवायत से,
मलाल ये कि मेरा काम बदल जाता है..
प्याला खनका भी नहीं,पैमाना छलका भी नहीं
नशा जमा भी नहीं कि जाम बदल जाता है
अजीब महफिल है,अजीब आलम है..
दो महीना भी नहीं,निज़ाम बदल जाता है।
भरोसा मिलता है कुछ घर लौट कर जाते जाते
वापस आने पर पैगाम बदल जाता है
यहां इंसान भी फिरता है हालात-ए-वक्त की तरह
चेहरा देखकर सलाम बदल जाता है...
मिज़ाजे हुक्मरां तय करती है हवा-ए-रुख़
वक़्त के साथ खास-ओ-आम बदल जाता है
हर-एक-शख्स ने चेहरे पर डाल रख्खी है नक़ाब
ज़रुरत जैसी वैसा नाम बदल जाता है
वही है देखो जिसने अंधेरों में फैलाई अफ़वा
सुबह हुई तो वो सरेआम बदल जाता है..
अजीब शहर है अजब सियासत है..
सुबह कुछ और है...शाम बदल जाता है..
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