मैं अन्ना का समर्थक हूं....
बाकी देशवासियों की तरह मैने भी अन्ना टीम का ड्राफ्ट किया जन लोकपाल बिल नहीं पढ़ा...लेकिन मैं अन्ना के इस आंदोलन का समर्थन कर रहा हूं बल्कि इस आंदोलन में शामिल होकर अब तो इस मुहिम का एक हिस्सा भी बन गया हूं क्योंकि सवाल सिर्फ जन लोकपाल बिल का ही नहीं है सवाल जन आंदोलन का है...जन भावनाओं का है..जनता की आवाज़ का है...सवाल सत्ता के मद में मगरुर मंत्रियों, नेताओं के तानाशाही रवैये का है..बहुत पहले मैने अंग्रेजी का कोई उपन्यास पढ़ा था जिसमें कुछ इस तरह की लाइनें लिखी थीं कि “सत्ता किसी की भी हो, तंत्र कोई भी हो अगर बहुत दिनों तक वो अपनी ही करता रहे..जनता की ओर से उसके खिलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठे तो वो जड़ हो जाता है, अवाम(जनता/ प्रजा) को अपना गुलाम समझने लगता है..उसका रवैया तानाशाही का हो जाता है....फिर वो अपने को ही सर्वोपरि मानता है...अपने ही किए को बेहतर मानता है, उसे लगता है कि वहीं सच है और वो जो कह रहा है, कर रहा है वही सही...फिर अगर उसके खिलाफ़ कहीं से भी कोई भी आवाज़ उठे तो वो तुरंत इसे दबाने की या यूं कहे कि कुचलने की कोशिश करता है” (ऐसा हमारे देश में भी हो चुका है जब इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में उठे सम्पूर्ण क्रांन्ति को कुचलने को लिए क्या नहीं किया...यहां तक कि देश के इतिहास में इंमरजेंसी का काला अध्याय भी जुड़ गया...) इसलिए समय समय पर सत्ता के खिलाफ़ आवाज़ उठनी ही चाहिए...और अब अन्ना की अगुवाई में यही आवाज़ पूरे हिंदुस्तान में सुनाई दे रही है...चलिए पहले मैं सत्ता, सरकार और संसद की दलीलों पर ही बात करता हूं...सरकार, मंत्री और संसद में बैठे हुए कई सांसद इस बात की दुहाई दे रहे हैं कि कानून बनाना संसद का अधिकार है, मैं भी मानता हूं लेकिन सवाल है कि किस तरह का कानून और कब तक कानून ? क्या इतना अहम कानून आगे आने वाले दस बीस सालों में बनेगा..जब तक देश पूरी तरह खोखला हो चुका होगा, कंगाल हो चुका होगा..जब कर्ज का बोझ ढोते ढोते हम थक चुके होगें, निढाल हो चुके होंगे, हमारा भविष्य भी कर्जदार हो चुका होगा और हमारी आने वाली पीढ़ियां, हमारे बेटे बेटियां, हमारी नस्लें अपनी उम्र और औक़ात से ज्यादा का कर्ज लेकर पैदा होंगी, फिर आएगा कोई एक ढीला ढाला सा, गोलमोल सा कानून ? मैं भी अपने देश के प्रधानमंत्री का बहुत सम्मान करता हूं, मेरे लिए भी मेरे प्रधानमंत्री का दर्जा बहुत ऊंचा है, बहुत सम्मानित है, प्रधानमंत्री क्या बल्कि मैं तो अपने देश के हर नौकरशाह, क्लर्क और चपरासी का सम्मान करता हूं और उससे उम्मीद करता हूं कि वो कर्तव्यपरायण हो, ईमानदार हो और इसिलिए मैं ये भी चाहता हूं कि मेरा प्रधानमंत्री भी ईमानदार हो, मेरा प्रधानमंत्री ऐसा हो जिस पर देश ही नहीं बल्कि दुनिया नाज़ करे...और अगर इसिलिए मैं चाहता हूं कि मेरे देश के संविधान में ऐसी धारा हो मेरे देश में ऐसा कानून हो जो देश के प्रधानमंत्री का भी परीक्षण कर सके तो इसमें ग़लत क्या है? मैने देश के संविधान का उल्लंघन कहां किया? मैने देश के कानून का मज़ाक कहां उड़ाया? मैने संसद की गरिमा को ठेस कहां पहुंचाई? मैं सरकारी लोकपाल नहीं जानता, मैं जन लोकपाल नहीं जानता, मैं संसद के तौर तरीके, उसका अधिकार, उसकी सीमा नहीं जानता...सच तो ये है कि मैं संविधान का एबीसीडी भी नहीं जानता लेकिन मैं इतना जानता हूं कि जिस संविधान की दुहाई मेरे देश के हुक़्मरान, सत्ता के नुमाइंदे, संसद के कई सदस्य दे रहे हैं उसने मुझे इतना अधिकार दिया है कि मैं अपने अधिकारों की मांग कर सकता हूं, अपना भला बुरा सोच सकता हूं, अपने हक़ की लड़ाई लड़ सकता हूं और अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए अपने देश की सड़क पर भी उतर सकता हूं..कोई सरकार मुझे रोक नहीं सकती...सवाल ये भी है कि इस तरह की स्थिति आई ही क्यों? पिछले दिनों जो हमारे देश में हुआ, जो हमारे मंत्रियों, सरकारी संस्थाओं ने किया या जो उन पर आरोप लगे उसने पूरी दुनिया में हिंदुस्तान का सिर शर्म से नीचा कर दिया, ये सिर्फ पिछले दिनों की ही बात नहीं है ऐसा पहली बार नहीं हुआ पहले भी घोटाला हो चुका है, मंत्रियों पर घोटाले का, भ्रष्टाचार करने का आरोप लग चुका है, यहां तक कि प्रधानमंत्री तक पर ये आरोप लग चुका है लेकिन क्या हुआ? कौन दोषी ठहराया गया या किस पर आरोप सिद्ध हुआ, अरे जाने दीजिए अपने उपर आरोप लिए लिए कितने लोग तो परलोक सिधार गए लेकिन फैसला नहीं हो पाया, यहां तक की जांच ही पूरी नहीं हुई, मैं नहीं चाहता कि ये रवायत आगे भी चलती रहे, अन्ना नहीं चाहते कि उनके प्रधानमंत्री को लोग इस शको सुबहा से देखें, संविधान नहीं चाहता कि हमने अपने हक़ की लड़ाई क्यों नहीं लड़ी? अवाम नहीं चाहती कि उसके नेताओं पर, उसके अगुवा पर इस तरह का दाग लगता रहे, देश गर्त में जाता रहे जिससे आने वाली पीढियां हमसे पूछे कि हमने इसके खिलाफ़ आवाज़ क्यों नहीं उठाई? और यही कारण है कि आज जनता सड़क पर है, लोग अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर आंदोलन में पहुंच रहे हैं कि तुम भी इस क्रांति के सिपाही बन जाओ और देखो कभी ये मत कहना कि हमने इस रवायत, इस तानाशाही, इस दुर्व्यवस्था के खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई...सब जानते और मानते हैं कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री सिर्फ शालीन ही नहीं बल्कि बेहद ईमानदार भी हैं लेकिन हमारे देश में अभी जो पिछले दिनों हुआ है उसने प्रधानमंत्री की आम जनता में क्या इमेज़ बनाई है...क्या प्रधानमंत्री की ओर कीचड़ नहीं उछला? क्या लगता है क्या इससे हमारे मन में गुबार पैदा नहीं हुआ? क्या इससे हजारे के दिल को ठेस नहीं पहुंची? तो फिर क्यों न करें लोग जन लोकपाल बिल की मांग, अन्ना क्यों न करें अनशन, आंदोलन, हम क्यों न करें उनका समर्थन? एक गवांर, गरीब, बुजुर्ग, बेवा महिला जब अपना पेट पालने के लिए वृद्धा या विधवा पेंसन का कागज बनवाने जाती है और उसको दस तरह का नियम कानून बताकर उससे घूस मांगा जाता है, फिर अगर किसी तरह ले देकर उसने कागज बनवा लिया तो फिर 150 रुपए पेंसन पाने के लिए उसे 50 से 70 रुपए फिर घूस देना पड़ता तो उससे पूछिए उसके दिल पर क्या गुजरती है, उसे अपनी ज़िदगी ही बोझ लगने लगती है, किसान को जब सोसाइटी से खाद बीज के लिए, अपनी साल भर की पूंजी लगाकर उगाई गई और आगे की आजीविका, सूखती फसल को सीचने के लिए बिगड़े सरकारी ट्रांसफॉर्मर का तार जुड़वाने का घूस देना पड़ता है तो उसका कलेजा मुंह को आ जाता है...नीचे का करप्शन तभी ख़त्म होगा जब उपर से शुरुआत होगी, एक नई पहल होगी...सभी घूस देते हैं, हजारों लोग घूस लेते हैं लेकिन क्या करें मज़बूरी है, दस्तूर है उपर देना होता है, मंत्री तक पहुंचाना होता है, भ्रष्टाचार से सब परेशान हैं, महंगाई सबको मारती है, इसलिए लोगों को अन्ना की आवाज़ मधुर लग रही है, आंदोलन की धूप सुहानी लग रही है, आंदोलन का हर नारा राष्ट्रगान लग रहा है और लोग सड़क पर उतर रहे हैं....इसलिए आज मैं भी इस आंदोलन का हिस्सा हूं, सरकार के लिए तो यह एक अच्छा मौक़ा है उसे आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए, अन्ना और उनकी टीम को धन्यवाद करना चाहिए, अन्ना को हाथो हाथ लेना चाहिए और सिर्फ देश में ही नहीं, अवाम के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक मिसाल क़ायम करना चाहिए....
कोरे कागजों में सिमटी ग़ुमनाम जिंदगी... मैं अजब हूं, अगर अजब दास्तान लिख सकूं कोरे कागज़ पर हृदय का सब तुफ़ान लिख सकूं...
Sunday, August 21, 2011
Monday, March 28, 2011
अजीब शहर है अजब सियासत है.
ऩजर उठी थी तो आगाज़-ए-साज़ और बजा
नज़र झुकी कि अंजाम बदल जाता है...
मुझे न खौफ़ है न खुंदश है इस रवायत से,
मलाल ये कि मेरा काम बदल जाता है..
प्याला खनका भी नहीं,पैमाना छलका भी नहीं
नशा जमा भी नहीं कि जाम बदल जाता है
अजीब महफिल है,अजीब आलम है..
दो महीना भी नहीं,निज़ाम बदल जाता है।
भरोसा मिलता है कुछ घर लौट कर जाते जाते
वापस आने पर पैगाम बदल जाता है
यहां इंसान भी फिरता है हालात-ए-वक्त की तरह
चेहरा देखकर सलाम बदल जाता है...
मिज़ाजे हुक्मरां तय करती है हवा-ए-रुख़
वक़्त के साथ खास-ओ-आम बदल जाता है
हर-एक-शख्स ने चेहरे पर डाल रख्खी है नक़ाब
ज़रुरत जैसी वैसा नाम बदल जाता है
वही है देखो जिसने अंधेरों में फैलाई अफ़वा
सुबह हुई तो वो सरेआम बदल जाता है..
अजीब शहर है अजब सियासत है..
सुबह कुछ और है...शाम बदल जाता है..
नज़र झुकी कि अंजाम बदल जाता है...
मुझे न खौफ़ है न खुंदश है इस रवायत से,
मलाल ये कि मेरा काम बदल जाता है..
प्याला खनका भी नहीं,पैमाना छलका भी नहीं
नशा जमा भी नहीं कि जाम बदल जाता है
अजीब महफिल है,अजीब आलम है..
दो महीना भी नहीं,निज़ाम बदल जाता है।
भरोसा मिलता है कुछ घर लौट कर जाते जाते
वापस आने पर पैगाम बदल जाता है
यहां इंसान भी फिरता है हालात-ए-वक्त की तरह
चेहरा देखकर सलाम बदल जाता है...
मिज़ाजे हुक्मरां तय करती है हवा-ए-रुख़
वक़्त के साथ खास-ओ-आम बदल जाता है
हर-एक-शख्स ने चेहरे पर डाल रख्खी है नक़ाब
ज़रुरत जैसी वैसा नाम बदल जाता है
वही है देखो जिसने अंधेरों में फैलाई अफ़वा
सुबह हुई तो वो सरेआम बदल जाता है..
अजीब शहर है अजब सियासत है..
सुबह कुछ और है...शाम बदल जाता है..
वो अपनी जगह पर ठीक था...
वो अपनी जगह पर ठीक था,मैं अपनी जगह जायज़
कुछ हालात ही ऐसे थे कि हम मिल नहीं पाए,
जिन्होने बात छेड़ी थी उसूलों की उन्हे देखो
बहुत दिन तक उसूलों पर कभी वो टिक नहीं पाए...
कुछ मेरी अपनी शर्तें थी,कुछ उसके अपने पहलू थे..
उसने ना हाथ बढ़ाया,कभी हम झुक नहीं पाए...
लाखों लाख लेकर लोगों ने क़ीमत लगाई थी
हमने ख़ुद को नहीं बेचा,वो भी बिक नहीं पाए...
ये दस्तूरे ज़माना है,हमने ख़ुद को ही समझाया
न आंखे बंद कर पाया,ज़ुबा भी सिल नहीं पाए..
अजीब शहर है यारों,अजब के लोग रहते हैं..
बड़ा दिमाग पाया है छोटा सा दिल नहीं पाए..
कुछ हालात ही ऐसे थे कि हम मिल नहीं पाए,
जिन्होने बात छेड़ी थी उसूलों की उन्हे देखो
बहुत दिन तक उसूलों पर कभी वो टिक नहीं पाए...
कुछ मेरी अपनी शर्तें थी,कुछ उसके अपने पहलू थे..
उसने ना हाथ बढ़ाया,कभी हम झुक नहीं पाए...
लाखों लाख लेकर लोगों ने क़ीमत लगाई थी
हमने ख़ुद को नहीं बेचा,वो भी बिक नहीं पाए...
ये दस्तूरे ज़माना है,हमने ख़ुद को ही समझाया
न आंखे बंद कर पाया,ज़ुबा भी सिल नहीं पाए..
अजीब शहर है यारों,अजब के लोग रहते हैं..
बड़ा दिमाग पाया है छोटा सा दिल नहीं पाए..
Monday, November 22, 2010
बेमौसम बदले मौसम ने दिवाना कर दिया...
इस हक़ीकत को झुठलाना खुद के साथ भी नाइंसाफी होगी कि बिन बुलाए, बैमौसम आए..बारिश ने प्रकृति को सुहाना बना दिया और दिल को दिवाना....लेकिन दिल के कहीं उदास कोने में बैठी एक कठोर सच्चाई पहले झुंझलाई फिर एक पीड़ा भरी गान गुनगुनाई जिसमें मेघ से उसके प्रताड़ना की उलाहना भी है और प्रणय निवेदन भी...सालों से बारिश की बेरुखी ने न जाने कितने आशियानों की ज़िंदगी
बरसो मेघ झमककर बरसो....
बिजली संग मटककर बरसो
आंख सहमकर दिल भर जाए...
ऐसा रंग चमककर बरसो...
सूखे खेत, हैं ताल भी सूखे...
बिन पानी तालाब भी भूखे...
भर जाए पेट और बह जाए पानी
ऐसा आज बहक कर बरसो....
बरसो मेघ झमककर बरसो...
बिजली संग चमककर बरसो....
जंगल जल गए...नदियां सूखीं...
राह निहारत तुझसे रुठीं...
अब न सताओ इन्हे मनाओ
इनकी दर महक कर बरसो
बरसो मेघ झमककर बरसो
बरसो मेघ झमककर बरसो....
बिजली संग मटककर बरसो
आंख सहमकर दिल भर जाए...
ऐसा रंग चमककर बरसो...
सूखे खेत, हैं ताल भी सूखे...
बिन पानी तालाब भी भूखे...
भर जाए पेट और बह जाए पानी
ऐसा आज बहक कर बरसो....
बरसो मेघ झमककर बरसो...
बिजली संग चमककर बरसो....
जंगल जल गए...नदियां सूखीं...
राह निहारत तुझसे रुठीं...
अब न सताओ इन्हे मनाओ
इनकी दर महक कर बरसो
बरसो मेघ झमककर बरसो
Wednesday, October 27, 2010
चलिए आज आपको अपने गांव लेकर चलता हूं..
चलिए आपको अपने गांव लेकर चलता हूं...
पतली पगडंडी,घनी अमराइयों की छांव लेकर चलता हूं..
भोले की नगरी से 10 मील दूर ही है घर मेरा...
थून्ही है गांव चंदवक कस्बा ही शहर मेरा..
वही बाजार जहां चप्पल ना मिले बाटा की..
लेकिन हर रोज जहां बोली लगती टाटा की..
.....
.....क्रमशः जारी है...
पतली पगडंडी,घनी अमराइयों की छांव लेकर चलता हूं..
भोले की नगरी से 10 मील दूर ही है घर मेरा...
थून्ही है गांव चंदवक कस्बा ही शहर मेरा..
वही बाजार जहां चप्पल ना मिले बाटा की..
लेकिन हर रोज जहां बोली लगती टाटा की..
.....
.....क्रमशः जारी है...
अपना गांव भी अब बेगाना हो गया...

अब अपना गांव वो पुराना नहीं लगता...
किसी पिकनिक स्पॉट सा वो मौसियाना नहीं लगता
शादियां भी तो अब होती हैं हड़बड़ाहट में
बरगद के नीचे वो शामियाना नहीं लगता।
पोखरी गांव की आबादी में तब्दील हुई,
ताल बंटवारे के खेतों में हलाल हुआ
कोट कटकर जब परधान की दालान बनी
सुना कि इसको लेकर थोड़ा गांव में बवाल हुआ..
चार जो पेड़ थे पीपल के चारों कोनों पर..
हां वहीं पेड़ जिसमें लोग जल चढ़ाते थे
एक वो नीम का भी पेड़ था जिसके नीचे,
मुंशी जी डंडा लेकर हमे क..ख..ग..पढ़ाते थे..
कट गए पेड़ वो सारे कि एक झटके में..
बचपन में देखते जिस पर कुछ मिट्टी के मटके में
जानते हैं कि हुआ हश्र क्या उन पेड़ों का..
जल गए धूंधू कर सुनील सिंह के भट्टे में..
ऐसा नहीं था कि उन पेड़ों की उम्र पूरी थी..
या वो पेड़ गांव की विकास को अखरते थे..
ये अलग बात है कि बुढ़े बुढ़िया भी यूं बस चुप ही रहे..
शायद कुछ लोग थे जो सुनील सिंह से डरते थे..
....
....क्रमशः जारी है...
इसी शहर ने मेरी पहचान मुझसे छीन लिया

मेरे शहर ने मेरी पहचान मुझसे छीन लिया..
और..नई चलन ने मेरी ज़ुबान मुझसे छीन लिया..
पेट की भूख ने कुछ इस क़दर दस्तक दे दी..
ग़ुम मुस्कान हुई...और ईमान मुझसे छीन लिया..
....
....
नई पीढ़िया ग़ुम हुई नए तरानों में...
पुराने किस्से नहीं रह गए अफ़सानों में..
नानी की कहानियों की बात भी अब जाने दीजै,
गांव के बोल भी अब खो गए वीरानों में..
.....
.....क्रमशः जारी है....
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दिल से निकला दिल का दर्द....
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